उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिला कारागार के जेल अधीक्षक साहब ही साइबर ठगी का शिकार हो गए! जी हाँ, वही साहब जिनके नाम के खौफ से बड़े-बड़े अपराधी बैरकों में दुबक जाते हैं, उन्हें एक "डिजिटल अपराधी" ने फोन पर ही 'कैदी' बना लिया। ठगों ने उनकी बेटी का नाम लिया और साहब का'अभिभावक हृदय' पिघल गया। न प्रोटोकॉल याद रहा, न साइबर सेल की चेतावनी।
अपराधी अब जेल के अंदर नहीं, लिंक के अंदर रहते हैं।
जो साहब सलाखों के पीछे दुनिया बंद रखते हैं, उन्हें एक ओटीपी' ने खुली हवा में लूट लिया।
अब अपराधियों को जेल भेजने की ज़रूरत नहीं है, वो ज़ूम कॉल और व्हाट्सएप कॉल से ही 'उगाही' का कोटा पूरा कर रहे हैं।
साहब, अपराधी अब जंजीरें नहीं, इंटरनेट कनेक्शन लेकर घूम रहे हैं। अब देखना ये है कि जेल अधीक्षक साहब उन ठगों को अपनी जेल में मेहमान नवाजी का मौका दे पाते हैं या ठग इस पैसे से कहीं और अपनी 'जेल' बना चुके हैं।
सावधान रहें, सतर्क रहें! क्योंकि जब 'सिस्टम' खुद ठगा जा सकता है, तो आप और हम तो केवल 'सॉफ्ट टारगेट' हैं।
क्या है पूरा मामला
जेल अधीक्षक पंकज कुमार सिंह ने पुलिस को तहरीर देकर बताया कि नीट काउंसिलिंग के द्वारा बेटी को उन्हें मेडिकल कालेज में प्रवेश दिलाना था। इसके लिए उन्होंने जस्ट डायल के माध्यम से लखनऊ गोमतीनगर के स्टडी पाथवे कंसलटेंसी के प्रोपराइटर अभिनव शर्मा से उनके मोबाइल नंबर पर संपर्क किया। अभिनव ने हिंद इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंस सफेदाबाद बाराबंकी में प्रवेश सुरक्षित कराने के नाम पर 19 जुलाई 2025 को 10-10 लाख के इसी कालेज के नाम के दो बैंक ड्राफ्ट लिए।
इसके बाद आरोपित अभिनव ने 24 अगस्त 2025 को अपने कोटक महिंद्रा बैंक, गोमतीनगर लखनऊ के खाते में तीन लाख रुपये डालने को कहे। जेल अधीक्षक के अनुसार उन्होंने अपनी पत्नी के खाते से तीन लाख रुपये उसके बताए गए खाते में आरटीजीएस के जरिए भुगतान किए। कुछ दिन बाद अभिनव शर्मा से मोबाइल नंबर पर बात करने का प्रयास किया तो मोबाइल बंद जाता रहा। उनके कार्यालय विजयपंत खंड गोमतीनगर लखनऊ पहुंचा तो वह भी बंद मिला।जिसको बाद उन्होंने मुकदमा दर्ज कराया।
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