बांसगांव पुलिस पर उठे गंभीर सवाल: 'प्रयागराज में थे युवक, गोरखपुर में दर्ज हो गया मुकदमा', क्या बेगुनाह भेजे गए जेल!

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के बांसगांव थाना क्षेत्र से पुलिस कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा करने वाला एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। आरोप है कि पुलिस ने बिना किसी प्राथमिक जांच और तकनीकी साक्ष्यों के सत्यापन के, दो ऐसे युवकों को सलाखों के पीछे भेज दिया, जो घटना के समय मौके पर मौजूद ही नहीं थे। इस मामले ने 'निष्पक्ष जांच' के दावों पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं।

क्या है पूरा मामला

बांसगांव पुलिस ने अपराध संख्या 0032/2026 के तहत भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 109, 115(2), 352 और 351(3) में शशांक शुक्ला उर्फ निखिल और सत्यम पाण्डेय नाम के दो युवकों को आरोपी बनाकर जेल भेज दिया है।
लेकिन इस कार्रवाई के खिलाफ प्रार्थी प्रवेश कुमार पाण्डेय ने प्रेस क्लब गोरखपुर में दस्तक दी है। उन्होंने साक्ष्यों के साथ दावा किया है कि यह पूरी एफआईआर फर्जी और मनगढ़ंत तथ्यों पर आधारित है।

तकनीकी साक्ष्य दे रहे बेगुनाही की गवाही!

परिजनों का दावा है कि 19 जनवरी 2026 को दोनों युवक एक बोलेरो (UP-57 AQ 9121) से प्रयागराज से गोरखपुर लौट रहे थे।
दोपहर 2:00 बजे: प्रयागराज से प्रस्थान।
रात 8:30 बजे: बेलघाट क्षेत्र में मौजूदगी।
रात 11:00 बजे: बांसगांव क्षेत्र में आगमन।
प्रवेश पाण्डेय का कहना है कि इस पूरी यात्रा के CCTV फुटेज, टोल प्लाजा के रिकॉर्ड और मोबाइल लोकेशन जैसे पुख्ता सबूत मौजूद हैं। ये साक्ष्य चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि जिस समय की घटना बताई जा रही है, उस समय युवक घटनास्थल से कोसों दूर थे।

"जब पुलिस के पास CCTV और लोकेशन जैसे वैज्ञानिक साक्ष्य मौजूद थे, तो उन्हें नजरअंदाज क्यों किया गया? बिना जांच के किसी को जेल भेज देना न्याय नहीं, बल्कि अधिकारों का हनन है।" - प्रार्थी पक्ष
 
पुलिस का पक्ष और जांच का आश्वासन!

मामले की गंभीरता को देखते हुए पीड़ित पक्ष ने एसपी नॉर्थ ज्ञानेंद्र कुमार से मुलाकात की। एसपी नॉर्थ ने मामले को गंभीरता से लेते हुए इसकी जांच क्षेत्राधिकारी (CO) को सौंप दी है। वहीं, बांसगांव थाना प्रभारी जितेंद्र कुमार सिंह का कहना है कि विवेचना जारी है और निर्दोषों को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिलेगा।

बड़ा सवाल: पहले जेल, फिर जांच क्यों?

कानून का बुनियादी सिद्धांत है कि 'भले सौ गुनहगार छूट जाएं, पर एक भी निर्दोष को सजा न मिले।' ऐसे में सवाल यह है कि:
अगर विवेचना अभी चल रही है, तो बिना तकनीकी सत्यापन के गिरफ्तारी में इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई गई?
क्या पुलिस ने स्वतंत्र गवाहों या साक्ष्यों की पड़ताल करना जरूरी नहीं समझा!
क्या यह कार्रवाई किसी दबाव या दुर्भावना के चलते की गई है?

निष्कर्ष

यह मामला सिर्फ दो युवकों की गिरफ्तारी का नहीं है, बल्कि पुलिसिया इकबाल और जनता के भरोसे का है। फिलहाल जांच सीओ स्तर पर है। अब देखना यह होगा कि क्या गोरखपुर पुलिस अपनी गलती सुधारते हुए निर्दोषों को न्याय दिलाती है, या फिर यह मामला भी फाइलों के बोझ तले दबकर रह जाएगा।

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